Monday, July 20, 2026
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मनोज इष्टवाल की कॉफी टेबल बुक ‘कण्वाश्रम’ पुस्तक का भव्य विमोचन

कोटद्वार (विशेष संवाददाता): कोटद्वार में वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक मनोज इष्टवाल की कॉफी टेबल बुक ‘कण्वाश्रम’ पुस्तक का भव्य विमोचन किया गया। एक सैन्य समारोह में आयोजित इस कार्यक्रम में उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष ऋतु भूषण खण्डूड़ी, पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी, मेयर शैलेन्द्र रावत और लेफ्टिनेंट जनरल जे एस नेगी सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से पुस्तक का विमोचन किया।

यह पुस्तक मात्र एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि वर्षों के गहन शोध का परिणाम है। लेखक मनोज इष्टवाल ने प्राचीन ग्रंथों, पुरातात्विक साक्ष्यों, लोक कथाओं और स्थल पर किए पैदल ट्रेक के माध्यम से कण्वाश्रम की पौराणिक गाथा को जीवंत रूप दिया है। पुस्तक में आकर्षक चित्रों के साथ विस्तृत विवरण युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम बनेगा।

कण्वाश्रम: भारतवर्ष की पौराणिक नींव

कण्वाश्रम कोटद्वार से लगभग 14-16 किलोमीटर दूर मालिनी (मालन) नदी के तट पर स्थित है। यह स्थल महर्षि कण्व की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध है, जहां राजा दुष्यंत और शकुंतला का प्रेम प्रसंग घटित हुआ और उनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत का जन्म हुआ। महाभारत, स्कंद पुराण, अभिज्ञान शाकुंतलम (कालिदास) और अन्य प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख है।

कथा के अनुसार, विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने अप्सरा मेनका को भेजा। उनके संयोग से जन्मी शकुंतला को मेनका छोड़ गई। महर्षि कण्व ने शकुन्त पक्षियों द्वारा सुरक्षित शिशु को आश्रम में पाला। दुष्यंत ने यहां शिकार के दौरान शकुंतला से विवाह किया (गांधार्व विवाह)। शकुंतला के पुत्र भरत ने विशाल साम्राज्य स्थापित किया, जिसके नाम पर देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, कण्वाश्रम लगभग 3500-5500 वर्ष पुराना माना जाता है। यह वैदिक शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जहां हजारों छात्र वेद, वेदांग और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते थे। मेगस्थनीज (चंद्रगुप्त मौर्य के यूनानी राजदूत) की ‘इंडिका’ में भी मालिनी नदी के तट पर स्थित इस आश्रम का उल्लेख है। ब्रिटिश पुरातत्वविद् सर कनिंघम ने 1865 में इसकी पुष्टि की।

12वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणकारियों (गौरी, इल्तुतमिश) ने हरिद्वार सहित इस क्षेत्र को नष्ट किया, जिससे आश्रम के भौतिक अवशेष क्षतिग्रस्त हुए। फिर भी, 1956 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री सम्पूर्णानंद (पंडित नेहरू के निर्देश पर) ने यहां स्मारक का शिलान्यास किया। आज यहां वसंत पंचमी मेला आयोजित होता है, जहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। पुरातत्व सर्वेक्षण की टीमें भी समय-समय पर खुदाई करती रहती हैं।

पर्यटन मंत्री, सतपाल महाराज ने पुस्तक को मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा “यह पुस्तक सिर्फ एक शोध ग्रंथ नहीं है, बल्कि देश के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने में एक मील का पत्थर साबित होगी। कण्वाश्रम का इतिहास भारतवर्ष की पहचान से सीधे जुड़ा हुआ है। मनोज इष्टवाल की यह कॉफी टेबल बुक सिर्फ सजाने के लिए नहीं, बल्कि संरक्षणीय भी है। कण्वाश्रम सिर्फ उत्तराखंड की नहीं, बल्कि पूरे देश की धरोहर है। पर्यटन विभाग इस पुस्तक के साक्ष्यों के आधार पर कण्वाश्रम को एक वैश्विक सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस पुस्तक के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों को समझने का मौका मिलेगा।”

 विधानसभा अध्यक्ष, ऋतु भूषण खण्डूड़ी ने वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक मनोज इष्टवाल की पुस्तक ‘कण्वाश्रम’ के विमोचन अवसर पर लेखक के शोध कार्य की मुक्त कंठ से सराहना की। उन्होंने कहा, “कोटद्वार और कण्वाश्रम का यह गौरवशाली इतिहास हर उत्तराखंडी को गौरवान्वित करता है। मनोज इष्टवाल जी ने वर्षों के गहन शोध के माध्यम से इस पौराणिक स्थल को नई पीढ़ी के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक मात्र एक किताब नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर का दस्तावेज है। कण्वाश्रम के विकास और इसके ऐतिहासिक स्वरूप को पुनर्जीवित करने के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे। राज्य सरकार इस दिशा में निरंतर कार्य कर रही है और कण्वाश्रम को पर्यटन व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।”

कृषि मंत्री, गणेश जोशी ने कहा “मनोज इष्टवाल जी ने इस पुस्तक के माध्यम से मात्र एक आश्रम की कहानी नहीं लिखी है, बल्कि पूरे उत्तराखंड और भारत की सांस्कृतिक तथा पौराणिक विरासत को जीवंत कर दिया है। कण्वाश्रम चक्रवर्ती सम्राट भरत की जन्मभूमि है, जिसके नाम पर हमारा देश ‘भारतवर्ष’ कहलाता है। यह पुस्तक शोधपरक होने के साथ-साथ बेहद आकर्षक कॉफी टेबल बुक के रूप में तैयार की गई है, जो युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ेगी। हमारी सरकार कण्वाश्रम के विकास को प्राथमिकता दे रही है। पर्यटन, सांस्कृतिक संरक्षण और कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इस स्थल को और बेहतर बनाया जाएगा। मनोज जी के इस शोधपूर्ण प्रयास को मैं पूरे मन से सराहता हूं और शुभकामनाएं देता हूं कि यह पुस्तक देश-विदेश में कण्वाश्रम की गरिमा को फैलाए।”

लेफ्टिनेंट जनरल जे एस नेगी (सेवानिवृत्त) ने मनोज इष्टवाल की पुस्तक ‘कण्वाश्रम’ की सराहना करते हुए इसे सैन्य एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा, “कण्वाश्रम न केवल पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक भी है। मनोज इष्टवाल जी ने इस पुस्तक के माध्यम से चक्रवर्ती सम्राट भरत की जन्मभूमि को नई पीढ़ी के समक्ष एक नई रोशनी में प्रस्तुत किया है। वर्षों के गहन शोध और तथ्यों पर आधारित यह कृति वास्तव में सराहनीय है। ऐसी पुस्तकें न सिर्फ इतिहास को संरक्षित करती हैं, बल्कि देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव की भावना को भी मजबूत करती हैं। कण्वाश्रम जैसे स्थलों का विकास और संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी है।”

अन्य अतिथियों ने भी मनोज इष्टवाल के प्रयासों की प्रशंसा की। सैन्य समारोह की गरिमा ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया।

लेखक का शोध सफर

मनोज इष्टवाल ने बताया, “मैं वर्षों से इस पर शोध कर रहा था। मालिनी नदी से ऊपर का पैदल ट्रेक किया, प्राचीन ग्रंथों और लोक कथाओं की खाक छानी। पुस्तक में तथ्यों का पूरा निचोड़ है।” उन्होंने आगे कहा कि यह शोध यात्रा आसान नहीं थी — दुर्गम रास्तों से होकर आश्रम स्थल तक पहुंचना, स्थानीय बुजुर्गों से मौखिक परंपराओं को सुनना और प्राचीन ग्रंथों में बिखरे संदर्भों को जोड़ना, यह सब वर्षों की मेहनत का परिणाम है। पुस्तक में भरत के भारतवर्ष बनने की विस्तृत कहानी, आश्रम के चित्र और पौराणिक वैभव शामिल हैं। हर अध्याय में ऐतिहासिक तथ्यों को कलात्मक चित्रों के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठक न केवल पढ़ें बल्कि उस युग को महसूस भी कर सकें। यह सजावटी कॉफी टेबल बुक होने के साथ संरक्षणीय भी है — यानी यह जितनी सुंदर है, उतनी ही ऐतिहासिक दृष्टि से मूल्यवान भी, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक दस्तावेज़ी धरोहर बनकर रहेगी।

सांस्कृतिक महत्व

कण्वाश्रम न केवल पौराणिक है, बल्कि पर्यटन, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मालिनी नदी की शीतल धारा, घने जंगल और हिमालय की गोद में बसा यह स्थल शांति का प्रतीक है। सरकार और स्थानीय समितियां (जैसे कण्वाश्रम विकास समिति) इसे राष्ट्रीय स्मारक बनाने और विकसित करने की दिशा में काम कर रही हैं।

मनोज इष्टवाल की ‘कण्वाश्रम’ पुस्तक ऐसे प्रयासों को बल देगी। दशकों के शोध का यह नतीजा न सिर्फ साहित्यिक योगदान है, बल्कि सांस्कृतिक जागरण का माध्यम भी। यह युवाओं को याद दिलाएगा कि भारत की पहचान महज भूगोल नहीं, बल्कि भरत जैसी विरासत है।

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