Friday, April 4, 2025
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आख़िर हिमालय के इस खूबसूरत पौधे से क्यों परेशान हैं यूरोप और अमेरिका

हिमालय की छोटी नदियों और जलधाराओं के किनारे चलते हुए अगर आपको कोई पौधा अपनी फटने की आवाज से चौंका दे, तो बहुत संभावना है कि यह हिमालयन बालसम (Himalayan Balsam) हो। यह पौधा, जो मूल रूप से हिमालय का है, आज यूरोप, अमेरिका और दुनिया के कई हिस्सों में फैल चुका है। हवा, इंसान या किसी जीव के संपर्क में आने पर इसके बीज छोटे-छोटे धमाकों के साथ फटते हैं, और यही खासियत इसे एक वैश्विक समस्या बना रही है। आखिर यह पौधा हिमालय से यूरोप तक कैसे पहुँचा और फिर पूरी दुनिया में कैसे फैल गया?

19वीं शताब्दी में, जब ब्रिटिश हुकूमत बंदूक के दम पर दुनिया को गुलाम बना रही थी और लंदन को भव्य बनाने में जुटी थी, तब हिमालय में घूम रहे कुछ ब्रिटिश अधिकारियों की नजर एक खूबसूरत गुलाबी फूल पर पड़ी। उन्हें लगा कि यह ठंडे इलाकों का पौधा लंदन की जलवायु में भी खिल सकता है। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों और ब्रिटेन के विशेषज्ञों के बीच चिट्ठियाँ लिखी जाने लगीं। उन पौधों की सूची में, जो लंदन भेजे जाने थे, हिमालयन बालसम भी शामिल हो गया।

सन् 1839 में यह गुलाबी फूल लंदन पहुँच गया और इसे नाम दिया गया “हिमालयन बालसम”। सबसे पहले इसे ब्रिटिश राजघराने के बगीचों में लगाया गया। अपनी खुशबू, सुंदर रंगों और पराग की वजह से यह पौधा भँवरों, मधुमक्खियों और लोगों को लुभाने लगा। धीरे-धीरे यह आम लोगों के बगीचों तक पहुँचा और फिर यूरोप, उत्तरी अमेरिका, जापान, न्यूजीलैंड जैसे देशों में फैल गया। ब्रिटिश साम्राज्य के गुलाम रहे देशों में भी यह पौधा ले जाया गया।

हिमालयन बालसम की सबसे बड़ी खासियत इसके बीजों का फटना है। सितंबर तक इसके फूल तैयार हो जाते हैं और बीज बैंक भर जाता है। इसके बाद छोटे-छोटे धमाकों के साथ बीज 5 से 7 मीटर की दूरी तक फैल जाते हैं। एक पौधा 800 से 2500 बीज पैदा कर सकता है। सर्दियों में पहला पाला पड़ते ही यह मर जाता है, लेकिन तब तक यह इतने बीज फैला चुका होता है कि अगले वसंत में लाखों नए पौधे उग आते हैं।

यह पौधा तालाबों और नदियों के किनारे तेजी से बढ़ता है। पानी के जरिए इसके बीज दूर-दूर तक बहते हैं और 2 साल तक जीवित रह सकते हैं। 2 से 2.5 मीटर की ऊँचाई तक बढ़ने वाला यह पौधा कम धूप में भी फलता-फूलता है। रिसर्च बताती है कि यह हवा, पानी और अन्य जीवों के सहारे अपनी आबादी बढ़ाने में माहिर है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह अपने नीचे दूसरे पौधों को उगने नहीं देता। अगर इसे छोटे अवस्था में जड़ समेत न उखाड़ा जाए, तो यह बार-बार पनपता है।

आज ब्रिटेन और अमेरिका में हर साल वसंत के बाद हिमालयन बालसम को हटाने के लिए बड़े अभियान चलाए जाते हैं। लोगों से अपील की जाती है कि अगर कहीं यह पौधा दिखे, तो उसकी रिपोर्ट करें। अन्य देशों में भी इसे साफ करने की कोशिशें होती हैं, लेकिन इसके प्रसार को पूरी तरह रोकना लगभग असंभव हो गया है। इसकी वजह इसकी तेजी से बढ़ने की क्षमता और बीजों का धमाकेदार फैलाव है।

हिमालयन बालसम अकेला ऐसा पौधा नहीं है, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचाया। जापानी नॉटवीड (Japanese Knotweed) भी ऐसा ही एक उदाहरण है, जो आज भारत समेत कई देशों में परेशानी का सबब बना हुआ है। औपनिवेशिक काल में सजावट और व्यापार के नाम पर कई पौधों को इधर-उधर ले जाया गया, जिसके परिणाम आज पर्यावरण पर भारी पड़ रहे हैं।

हिमालयन बालसम की कहानी एक खूबसूरत फूल से शुरू होकर पर्यावरणीय चुनौती तक पहुँच गई है। हिमालय की गोद में जन्मा यह पौधा आज दुनिया भर में अपनी धमाकेदार मौजूदगी दर्ज करा रहा है। यह हमें यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि मानव हस्तक्षेप प्रकृति के संतुलन को कैसे प्रभावित कर सकता है।

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