पिछले साल से चर्चा में रहा वक्फ बिल अब संसद में पेश हो चुका है। केंद्र सरकार इसे लोकसभा और राज्यसभा से पारित कराने की तैयारी में है, और संभवतः यह जल्द ही कानून का रूप ले लेगा। हालांकि, इस बिल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तनाव चरम पर है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर कानून से छेड़छाड़ कर समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश कर रही है, जबकि सरकार का कहना है कि वक्फ कानून में बदलाव समय की मांग बन गया था।
वक्फ क्या है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि वक्फ का मतलब क्या है। वक्फ एक इस्लामिक प्रथा है, जिसमें कोई भी व्यक्ति—चाहे वह किसी भी धर्म से हो—अपनी संपत्ति (जमीन, इमारत, पैसा आदि) को धार्मिक या परोपकारी उद्देश्यों के लिए दान कर सकता है। एक बार दान करने के बाद यह संपत्ति हमेशा के लिए उसी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल होती है और इसे वापस नहीं लिया जा सकता। उदाहरण के लिए, अगर कोई जमीन मस्जिद या स्कूल के लिए दान की गई, तो वह “अल्लाह की संपत्ति” मानी जाती है और केवल मस्जिद, स्कूल, अनाथालय, अस्पताल या गरीबों की मदद जैसे कार्यों के लिए उपयोग हो सकती है।
वक्फ कानून का इतिहास
भारत में वक्फ कानून की शुरुआत 1954 के वक्फ एक्ट से हुई थी। इसके बाद कई संशोधन हुए, और नवीनतम कानून 1995 का वक्फ एक्ट है। अब 2024 का वक्फ बिल इसी 1995 के कानून में बदलाव लाने के लिए पेश किया गया है। लेकिन इस बिल को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध जताया है। कांग्रेस इसे संविधान पर हमला बता रही है, तो कुछ का कहना है कि बीजेपी इससे समाज में स्थायी ध्रुवीकरण करना चाहती है।
बिल के पांच विवादास्पद मुद्दे
- वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति
वक्फ बोर्ड, जो वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करता है, में सरकार ने प्रस्ताव दिया कि गैर-मुस्लिम व्यक्ति भी मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हो सकते हैं और बोर्ड में कम से कम दो गैर-मुस्लिम सदस्य होने चाहिए। विपक्ष का कहना है कि यह धार्मिक मामला है, इसलिए बोर्ड में केवल मुस्लिम सदस्य ही होने चाहिए। हालांकि, संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने संशोधन सुझाया कि CEO कम से कम संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी हो और उसे इस्लामिक कानून की जानकारी हो। फिर भी, यह मुद्दा विवाद का केंद्र बना हुआ है। - सरकार को अधिक अधिकार
बिल में पहले प्रस्ताव था कि विवादित वक्फ संपत्तियों पर फैसला जिला कलेक्टर करेगा। अभी यह मामला वक्फ ट्रिब्यूनल के पास जाता है। JPC ने इसे बदलकर कहा कि राज्य सरकार एक वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त करेगी जो यह तय करेगा कि संपत्ति वक्फ की है या सरकार की। विपक्ष का आरोप है कि इससे सरकार अपने पक्ष में फैसले ले सकती है, जिससे वक्फ संपत्तियों पर उसका नियंत्रण बढ़ेगा। - वक्फ बाय यूजर का हटाया जाना
अभी तक अगर कोई संपत्ति लंबे समय से वक्फ के उद्देश्य (जैसे मस्जिद या स्कूल) के लिए इस्तेमाल हो रही थी, तो उसे “वक्फ बाय यूजर” मानकर वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया जाता था, भले ही उसके दस्तावेज न हों। नए बिल में यह प्रावधान हटाया जा रहा है। अब बिना दस्तावेज के ऐसी संपत्ति सरकार अपने पास ले सकती है। विपक्ष का कहना है कि इससे देशभर की कई वक्फ संपत्तियां खतरे में पड़ जाएंगी। - वक्फ संपत्तियों का डेटाबेस और जब्ती
बिल के मुताबिक, कानून लागू होने के छह महीने के भीतर सभी वक्फ संपत्तियों को रजिस्टर करना होगा। अगर कोई संपत्ति रजिस्टर नहीं हुई या उस पर विवाद हुआ, तो जिला कलेक्टर जांच करेगा और गैर-रजिस्टर्ड संपत्ति सरकार ले सकती है। इस मामले में कोर्ट में अपील का अधिकार भी नहीं होगा। JPC ने कुछ संपत्तियों के लिए समयसीमा बढ़ाने का सुझाव दिया, लेकिन विपक्ष इसे संपत्ति छीनने की साजिश बता रहा है। - ट्रिब्यूनल के फैसले पर हाई कोर्ट की भूमिका
अभी तक वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला अंतिम माना जाता था। नए बिल में ट्रिब्यूनल में जिला जज और संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी होंगे, और उनके फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी। विपक्ष का कहना है कि ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम होना चाहिए, जबकि सरकार इसे पारदर्शिता का कदम बता रही है।
क्या बिल पास होगा?
लोकसभा में एनडीए के पास 293 सांसद हैं, जो बहुमत से कहीं अधिक है। राज्यसभा में 245 सीटों में से 9 खाली हैं, और पास होने के लिए 119 वोट चाहिए। एनडीए के पास 121 वोट हैं, यानी यह वहां भी पास हो सकता है। हालांकि, एनडीए की सहयोगी जेडीयू (नीतीश कुमार) ने मांग की है कि बिल का लागू होना पुरानी संपत्तियों पर लागू न हो, खासकर “वक्फ बाय यूजर” के मामले में। यह देखना बाकी है कि बीजेपी अपने सहयोगी की बात मानेगी या नहीं।
विवाद का भविष्य
वक्फ बिल को लेकर मुस्लिम समुदाय में भी नाराजगी है। बिहार में हाल ही में नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी का कई मुस्लिम संगठनों ने बहिष्कार किया था। यह बिल न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील बना हुआ है। आने वाले दिनों में इसके प्रभाव और विरोध की दिशा साफ होगी।
वक्फ बिल 2024 के ये पांच मुद्दे ही इसे विवादों के केंद्र में लाए हैं। सरकार इसे सुधार का कदम बता रही है, तो विपक्ष इसे धार्मिक स्वायत्तता पर हमला करार दे रहा है। आप क्या सोचते हैं? यह बिल समाज के लिए जरूरी बदलाव लाएगा या विवाद को और गहरा करेगा?