भारत सरकार ने हाल ही में 150 से अधिक दवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है। इनमें क्रोसिन कोल्ड एंड फ्लू, विक्स एक्शन 500, डोलो कोल्ड और पैरासिटामोल व सेट्रिज़िन जैसी दवाओं के कॉम्बिनेशन शामिल हैं। ये दवाएं भारतीय घरों में आमतौर पर इस्तेमाल की जाती रही हैं, लेकिन अब इन्हें “अतार्किक” और “खतरनाक” मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया गया है। सरकार का यह कदम फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में बढ़ते अनैतिक प्रथाओं और ग्राहकों के स्वास्थ्य को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए उठाया गया है।
क्यों लगाया गया प्रतिबंध?
इन दवाओं को फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (FDC) के तहत बनाया गया है, जिसमें दो या दो से अधिक दवाओं को मिलाकर एक नया फॉर्मूला तैयार किया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ये कॉम्बिनेशन न केवल अप्रभावी हैं, बल्कि इनके दुष्प्रभाव भी गंभीर हो सकते हैं। सरकार का कहना है कि ये दवाएं मुख्य रूप से फार्मा कंपनियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए बनाई गई हैं, न कि मरीजों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर।
इस प्रतिबंध में डोलो कोल्ड जैसी दवाएं शामिल हैं, जिनमें चार एक्टिव इंग्रेडिएंट्स होते हैं, जबकि डोलो 650 जैसी दवाएं, जिनमें केवल पैरासिटामोल होता है, प्रतिबंधित नहीं हैं। इससे स्पष्ट है कि सरकार का फोकस अनावश्यक और खतरनाक कॉम्बिनेशन वाली दवाओं पर है।
डॉक्टर्स और फार्मा कंपनियों की भूमिका
इस प्रतिबंध ने फार्मा इंडस्ट्री और डॉक्टर्स के बीच चल रहे अनैतिक रिश्तों को भी उजागर किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फार्मा कंपनियां डॉक्टर्स को उपहार और कमीशन देकर अपने ब्रांडेड दवाओं को प्रिस्क्राइब करवाती हैं। एक बड़ा मामला डोलो की निर्माता कंपनी माइक्रो लैब्स का है, जिस पर आरोप लगा था कि उसने कोविड-19 महामारी के दौरान डॉक्टर्स को करोड़ों रुपये के उपहार दिए थे ताकि वे डोलो ब्रांड की दवाएं लिखें। इसके बाद डोलो 650 और डोलो कोल्ड जैसी दवाएं रातों-रात घर-घर में पॉपुलर हो गईं।
नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के नियमों के अनुसार, डॉक्टर्स को केवल दवाओं के जेनेरिक नाम लिखने चाहिए, न कि किसी खास ब्रांड का नाम। इससे मरीजों को सस्ती और प्रभावी दवाएं खरीदने का विकल्प मिलता है। हालांकि, अक्सर डॉक्टर्स ब्रांडेड दवाएं लिखकर मरीजों को महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर करते हैं।
नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM)
सरकार ने एसेंशियल ड्रग्स की एक लिस्ट जारी की है, जिसे नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) कहा जाता है। इस लिस्ट में 384 दवाएं शामिल हैं, जिन्हें भारत के स्वास्थ्य तंत्र के लिए जरूरी माना गया है। इन दवाओं की कीमतों पर सरकार ने एक कैप लगा रखा है ताकि ये सभी नागरिकों को सस्ती दरों पर उपलब्ध हो सकें। हालांकि, फार्मा कंपनियां अक्सर नए कॉम्बिनेशन बनाकर इस कीमत नियंत्रण को बायपास कर देती हैं।
फार्मा इंडस्ट्री का खेल
फार्मा कंपनियां अक्सर एक्टिव इंग्रेडिएंट्स में थोड़ा बदलाव करके नई दवाएं बाजार में उतार देती हैं। इससे वे एसेंशियल ड्रग्स लिस्ट में शामिल दवाओं की कीमत सीमा से बच जाती हैं और मनमाने दामों पर दवाएं बेचती हैं। इस प्रक्रिया में ग्राहकों को महंगी और अनावश्यक दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
दवा अनुमोदन में खामियां
भारत में दवाओं के अनुमोदन की प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं। कई फार्मा कंपनियां सीधे राज्य सरकारों से लाइसेंस लेकर दवाएं बनाना शुरू कर देती हैं, बिना केंद्रीय दवा नियामक संस्था (CDSCO) की मंजूरी के। इससे बाजार में हजारों अनअप्रूव्ड दवाएं घूम रही हैं, जिन्हें बाद में प्रतिबंधित किया जाता है। यह प्रक्रिया भ्रष्टाचार और लापरवाही की ओर इशारा करती है।
भारत सरकार का यह कदम स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, फार्मा इंडस्ट्री और डॉक्टर्स के बीच चल रहे अनैतिक रिश्तों को पूरी तरह से खत्म करने के लिए और सख्त नियमों और निगरानी की आवश्यकता है। इसके साथ ही, आम जनता को भी दवाओं के सही उपयोग और जेनेरिक दवाओं के बारे में जागरूक करने की जरूरत है।