Saturday, February 14, 2026
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शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) बने केदारपीठ के 325वें जगद्गुरु रावल

नांदेड़:  हिमालय की गोद में बसे केदारनाथ धाम, जो पंचकेदार में प्रमुख और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है, में एक महत्वपूर्ण धार्मिक परिवर्तन होने जा रहा है। केदारपीठ के 324वें जगद्गुरु रावल भीमाशंकर लिंग शिवाचार्य महाराज ने स्वास्थ्य कारणों से अपना पद त्यागने की घोषणा की है। 70 वर्षीय रावल ने महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित भीमाशंकर मठ में आयोजित अपने पट्टाभिषेक की रजत जयंती समारोह के दौरान यह फैसला लिया। समारोह में देशभर से आए संत-महात्मा, श्रद्धालु और शिष्यों की उपस्थिति में आठ दिवसीय विश्व शांति यज्ञ का समापन हुआ, जहां रावल ने अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) को उत्तराधिकारी नामित किया।

इस पावन अवसर पर रावल भीमाशंकर लिंग ने कहा, “परंपरा की निरंतरता और पीठ की गरिमा बनाए रखना सर्वोपरि है। इसलिए समय रहते उत्तराधिकारी का चयन आवश्यक है।” उन्होंने अपने शिष्य को माला एवं शाल ओढ़ाकर विधिवत दीक्षा प्रदान की। उपस्थित संतों ने इस निर्णय का स्वागत किया और इसे परंपरा के अनुरूप बताया। बीकेटीसी (बद्री-केदार टेम्पल कमिटी) के वरिष्ठ पुजारी शिव शंकर लिंग और नांदेड़ पहुंचे पूर्व प्रमुख लक्ष्मी प्रसाद भट्ट ने भी इसकी पुष्टि की, कि रावल ने अपने मठ में आयोजित कार्यक्रम में केदार लिंग महाराज को अपना उत्तराधिकारी चुना है।

औपचारिक प्रक्रिया

यह निर्णय औपचारिक रूप से महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर, 15 फरवरी 2026 को, पंचकेदारों की गद्दीस्थली ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में पुष्टि की जाएगी। इस अवसर पर क्षेत्र के हक-हकूकधारियों और दस्तूरधारियों, जैसे डंगवाड़ी, भटवाड़ी, चुनी-मंगोली, किमाणा एवं पचौली डुंगर सेमला गांवों के प्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे। इसके बाद, केदारनाथ धाम के कपाट बंद होने के उपरांत, वीरशैव संप्रदाय के पांच पीठों के पंचाचार्यों द्वारा सर्वसम्मति से समर्थन प्रदान कर 325वें केदार जगद्गुरु के रूप में उनका भव्य पट्टाभिषेक समारोह आयोजित किया जाएगा। विधिवत अनुष्ठानों और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच वे केदारपीठ के जगद्गुरु सिंहासन पर आसीन होंगे।

केदारनाथ धाम के कपाट साल में केवल 6 महीने खुले रहते हैं। शीतकाल में भगवान केदारनाथ की पूजा ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में होती है। समुद्र तल से लगभग 11,755 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह धाम सनातन धर्म के अनुयायियों का प्रमुख तीर्थ स्थल है।

रावल पद की परंपरा और इतिहास

केदारनाथ के रावल अविवाहित होते हैं और कर्नाटक के वीर शैव संप्रदाय से संबंध रखते हैं। वे शिव उपासक होते हैं और धाम की पूजा के मुख्य कर्ताधर्ता होते हैं। रावल कपाट खुलने और बंद होने के समय धाम में मौजूद रहते हैं। यह परंपरा करीब 400 वर्षों से चली आ रही है, जिसमें भुकुंड लिंग पहले रावल थे। वर्तमान रावल भीमाशंकर लिंग 324वें हैं। रावल पद पर विराजमान व्यक्ति धाम की धार्मिक परंपराओं, अनुष्ठानों और मुख्य पूजा का सर्वोच्च संरक्षक माना जाता है।

शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) बीते वर्षों से रावल भीमाशंकर लिंग के सान्निध्य में रहकर पूजा-अर्चना और परंपरागत विधि-विधान का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। उनके चयन से परंपरा की निरंतरता और अनुशासन कायम रहेगा। मंदिर समिति, पंचगांई, हकहकूक धारी, दस्तूर धारी, केदारसभा के सदस्यों एवं पंच पुजारियों की मौजूदगी में नए रावल की विधिवत घोषणा की जाएगी।

प्रमुख तथ्यों की तालिका

क्रमांक विवरण जानकारी
1 वर्तमान रावल जगद्गुरु भीमाशंकर लिंग शिवाचार्य (324वें)
2 आयु और कारण 70 वर्ष, स्वास्थ्य कारण
3 उत्तराधिकारी शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) – 325वें रावल
4 घोषणा की तिथि महाशिवरात्रि, 15 फरवरी 2026, ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ
5 पट्टाभिषेक कपाट बंद होने के बाद, पांच पीठों के पंचाचार्यों द्वारा
6 परंपरा की शुरुआत भुकुंड लिंग (पहले रावल), 400+ वर्ष पुरानी
7 संप्रदाय वीर शैव, कर्नाटक से
8 भूमिका मुख्य पूजा कर्ताधर्ता, अविवाहित शिव उपासक

यह परिवर्तन केदारनाथ धाम के इतिहास में एक नई कड़ी जोड़ रहा है। श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों में विशेष उत्साह है, क्योंकि आगामी चारधाम यात्रा से पहले यह निर्णय धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावल धाम की आध्यात्मिक परंपरा के जीवंत प्रतीक होते हैं। इस घटना से सनातन धर्म की एकता और निरंतरता का संदेश मिलता है, जो उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित इस पवित्र स्थल की महत्ता को और बढ़ाता है।

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