देहरादून: हिमालय की बर्फीली चोटियाँ सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि एशिया की प्रमुख नदियों की जीवनरेखा हैं। लेकिन इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन दशकों में हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर 12 फीसद सिकुड़ चुके हैं। इस क्षेत्र को ‘तीसरा ध्रुव’ भी कहा जाता है, और यहाँ हो रहे बदलाव अब केवल पर्यावरणीय संकट तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वैश्विक जल सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय तनाव का कारण बन सकते हैं।
ग्लेशियर संकट के चौंकाने वाले आंकड़े
ICIMOD की रिपोर्ट बताती है कि सन 1990 से 2020 के बीच हिंदूकुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की गति अभूतपूर्व रही। यह क्षेत्र तिब्बत, भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और चीन के कुछ हिस्सों में फैला है। शोध में साफ हुआ कि पिछले तीस वर्षों में ग्लेशियरों की मोटाई और विस्तार दोनों में 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यदि ग्लोबल वार्मिंग इसी गति से जारी रही, तो सदी के अंत तक हिमालय अपनी बर्फ का एक बड़ा हिस्सा खो सकता है।
वॉटर टावर से सूखते जलस्रोतों तक
देहरादून के वरिष्ठ पर्यावरणविद् अशीष गर्ग बताते हैं, “हिमालय के ग्लेशियर दुनिया भर को सींचने का काम करते हैं। इसलिए इन्हें ‘वॉटर टावर’ कहा जाता है। नदियों, झरनों और अन्य जलस्रोतों के माध्यम से यह पानी हम तक पहुँचता है।” गर्ग के अनुसार, जब गर्मियों में तापमान अधिक हो जाता है, तो भूमिगत जल नीचे चला जाता है और कई इलाकों में पानी की किल्लत होने लगती है। यदि ग्लेशियर ही खत्म हो गए, तो जलस्रोतों को रिचार्ज करने वाली यह व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। उन्होंने कहा, “भविष्य में पीने का पानी नहीं मिल पाएगा। यही कारण है कि विशेषज्ञ तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर होने की आशंका जताते हैं।”
हिमालय में बर्फ पिघलने का खतरा
ग्लेशियरों का पिघलना केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि यह भू-राजनीतिक समीकरण भी बदल सकता है। रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि ऊपरी तटवर्ती देश (जैसे चीन, भारत) यदि बढ़ते तापमान के कारण घटते जल प्रवाह को रोकने के लिए बांध या अन्य संरचनाएँ बनाते हैं, तो निचले देशों (जैसे बांग्लादेश, पाकिस्तान) के साथ तनाव बढ़ सकता है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का यह परिणाम पहले से ही सीमा पार जल विवादों को और उग्र बना सकता है।
ग्लेशियर विस्फोट के मामले बन रहे चेतावनी
पर्यावरणविद् अशीष गर्ग ने उत्तराखंड की त्रासदियों का जिक्र करते हुए कहा, “रैणी में ग्लेशियर बर्स्ट ने आपदा का वह रूप दिखाया, जहाँ कई मजदूरों की जान चली गई। दूसरी ओर, धराली आपदा के बाद कृत्रिम झील बन गई, जो अब खतरे का संकेत दे रही है। लद्दाख में भी ऐसी झीलें मौजूद हैं, जो कभी भी बड़ी तबाही ला सकती हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि ग्लेशियर पिघलने के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन यह समस्या वैश्विक है। फिर भी इसका सबसे अधिक नुकसान स्थानीय लोगों और राज्य को झेलना पड़ रहा है।
जल संकट और वैश्विक सुरक्षा के बीच सीधा संबंध
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना न केवल पेयजल संकट बढ़ाएगा, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन और जैव विविधता को भी अपूरणीय क्षति पहुँचाएगा। हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र लगभग दो अरब लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से जल उपलब्ध कराता है। जब यह जलस्रोत सूखने लगेंगे, तो प्रवासन, संघर्ष और आर्थिक अस्थिरता जैसे मुद्दे वैश्विक स्तर पर उभरेंगे।
ठोस कदमों की जरूरत
आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि कार्बन उत्सर्जन में तत्काल कटौती और अनुकूलन उपायों को प्राथमिकता देना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। पर्यावरणविद् अशीष गर्ग कहते हैं, “हमने अब तक कई रिपोर्टें देखी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव धीमा है। ग्लेशियर संकट को रोकने के लिए सिर्फ अंतरराष्ट्रीय समझौते काफी नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों को जल संरक्षण से जोड़ना होगा।”
विशेषज्ञ एक स्वर में कहते हैं कि तीसरे ध्रुव के रूप में जाना जाने वाला यह क्षेत्र अब संकट की घंटी बजा चुका है। ग्लेशियरों का पिघलना महज पर्यावरणीय आंकड़ा नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए खतरे की इबारत है। आवश्यकता है कि सरकारें, नीति-निर्माता और आम नागरिक इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मानकर ठोस कार्रवाई करें। देर होने से पहले, जल संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाना ही एकमात्र विकल्प है।
