शिक्षा हर व्यक्ति का मूलभूत अधिकार है और किसी भी देश की प्रगति का आधार है। फिर भी, सरकारें इस यूनिवर्सल जरूरत को पूरा करने में नाकाम क्यों हो रही है? अगर सरकारें वास्तव में quality education सुनिश्चित कर पा रही होती, तो देश में कुकुरमुत्तों की तरह उग आए प्राइवेट स्कूलों की जरूरत ही नहीं पड़ती। यह सवाल आज हर नागरिक के मन में उठता है, खासकर तब जब नागरिक अपने इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते हैं और उसमें 4% का “हेल्थ एंड एजुकेशन सेस” चुकाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पैसा वाकई शिक्षा के लिए इस्तेमाल हो रहा है, या यह सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गया है?
सरकारी स्कूलों की बदहाली
हाल ही में जनवरी 2025 में जारी यूडीआईएसई प्लस (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन) की रिपोर्ट सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति को बयां करती है। देश में 1 लाख से ज्यादा सरकारी स्कूलों में कार्यशील बिजली तक नहीं है। जब बिजली ही नहीं, तो कंप्यूटर लिटरेसी और डिजिटल शिक्षा की बात करना बेमानी है। इसी तरह, 46,000 सरकारी स्कूलों में काम करने वाले शौचालय नहीं हैं, और 13,000 स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा तक उपलब्ध नहीं है। ये आंकड़े सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को नहीं, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में संकट
अगर इंफ्रास्ट्रक्चर की बात छोड़ दें, तो सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता भी चिंता का विषय है। हाल ही में जारी एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) 2024 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का शैक्षिक स्तर बेहद खराब है। रिपोर्ट बताती है कि कक्षा 5 के कई बच्चे कक्षा 2 के स्तर की किताबें भी नहीं पढ़ पाते। गणित में बुनियादी जोड़-घटाव और हिंदी-अंग्रेजी में साधारण वाक्य समझने की क्षमता भी इन बच्चों में कमजोर है। यह स्थिति तब है, जब संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है।
प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता दबदबा
सरकारी स्कूलों की इस हालत के चलते माता-पिता मजबूरी में अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में प्राइवेट स्कूलों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। ये स्कूल मोटी फीस वसूलते हैं, लेकिन कम से कम बुनियादी सुविधाएं और बेहतर पढ़ाई का भरोसा तो देते हैं। सवाल यह है कि जब सरकार टैक्सपेयर्स से शिक्षा के नाम पर सेस वसूल रही है, तो उसे प्राइवेट स्कूलों पर निर्भरता क्यों बढ़ानी पड़ रही है? क्या यह सरकार की नाकामी का सबूत नहीं है कि वह अपने नागरिकों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में असफल रही है?
कहां है कमी?
भारत सरकार हर साल शिक्षा पर जीडीपी का लगभग 3-4% खर्च करती है, जो विकसित देशों (5-6%) से काफी कम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में 6% खर्च का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन वह अभी तक हकीकत से कोसों दूर है। जो बजट मिलता भी है, वह ज्यादातर वेतन और प्रशासनिक खर्चों में चला जाता है। इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार, शिक्षक प्रशिक्षण और तकनीकी संसाधनों पर निवेश न के बराबर है। इसके अलावा, सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। कई स्कूलों में एक ही शिक्षक सभी विषय पढ़ाता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ता है।
फिर भी सुधार क्यों नहीं?
हर टैक्सपेयर से लिया जाने वाला 4% हेल्थ एंड एजुकेशन सेस सालाना अरबों रुपये जुटाता है। लेकिन यह पैसा कहां जा रहा है? अगर यह स्कूलों तक पहुंच रहा होता, तो न बिजली की कमी होती, न शौचालयों की, और न ही बच्चों का शैक्षिक स्तर इतना गिरा होता। यह विडंबना है कि एक ओर सरकार डिजिटल इंडिया और स्किल इंडिया जैसे नारे देती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं तक मुहैया नहीं करा पा रही।
आगे की राह
शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। पहला कदम है बजट बढ़ाना और उसका सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना। दूसरा, शिक्षकों की भर्ती और उनके प्रशिक्षण पर ध्यान देना। तीसरा, तकनीक का उपयोग कर ग्रामीण क्षेत्रों तक क्वालिटी एजुकेशन पहुंचाना। प्राइवेट स्कूलों पर निर्भरता कम करने के लिए सरकारी स्कूलों को न सिर्फ सुविधाओं, बल्कि शिक्षण की गुणवत्ता में भी प्रतिस्पर्धी बनाना होगा।
शिक्षा किसी भी देश का भविष्य तय करती है। अगर सरकार इस फंडामेंटल जरूरत को पूरा नहीं कर सकती, तो प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता जाल और टैक्सपेयर्स का बढ़ता बोझ स्वाभाविक है। सवाल यह नहीं कि प्राइवेट स्कूल क्यों बढ़ रहे हैं, सवाल यह है कि सरकार अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभा रही? जब तक सरकारी स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय और क्वालिटी एजुकेशन नहीं होगा, तब तक “सब पढ़ें, सब बढ़ें” का नारा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगा। यह वक्त है कि सरकार जागे और शिक्षा को सिर्फ टैक्स वसूलने का जरिया न बनाकर, इसे हर बच्चे का हक बनाए।