Thursday, November 20, 2025
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पौड़ी में नवीन पटवाल ने बेशकीमती गुच्छी मशरूम को उगाने में हासिल की सफलता

पौड़ी, उत्तराखंड का एक ऐसा जिला जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ पलायन और बंजर खेतों के लिए भी जाना जाता है, आज एक नई उपलब्धि के साथ सुर्खियों में है। फलदाकोट गांव में गुच्ची मशरूम (जिसे वैज्ञानिक रूप से मोरचेला या मोरल्स के नाम से जाना जाता है) का सफल ट्रायल हुआ है, जो न केवल स्थानीय लोगों के लिए बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए एक बड़ी उम्मीद लेकर आया है। इस मशरूम की बाजार में कीमत 30,000 से 35,000 रुपये प्रति किलो तक है। इसकी खेती का सफल प्रयोग करने वाले नवीन पटवाल पिछले एक दशक से मशरूम के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उनकी यह उपलब्धि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।
गुच्ची मशरूम ठंडे इलाकों की फसल है, जो उच्च ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में ही उगाई जा सकती है। नवीन पटवाल बताते हैं कि इसकी खेती का विचार उनके मन में पिछले तीन साल से था। पहले दो साल असफलताओं से भरे रहे—पहले साल स्पॉन (बीज) तैयार करने में नाकामी मिली, तो दूसरे साल पिनहेड (मशरूम की शुरुआती अवस्था) में फसल खराब हो गई। लेकिन इन असफलताओं से सीखते हुए, तीसरे साल उन्होंने सफलता हासिल की। 28 दिसंबर को प्लांट की गई यह फसल अब हार्वेस्टिंग के लिए तैयार है, और मात्र एक छोटे से क्षेत्र में जंगल की तुलना में कहीं अधिक उत्पादन दे रही है।
इस मशरूम की खासियत यह है कि यह पूरी तरह से खोखला होता है, जिसे “ट्रू मोरल्स” कहा जाता है। बाजार में इसे “सुपर जंबो” साइज में बेचा जाता है, और इसकी हनीकॉम्ब संरचना इसे करेला चू (पहाड़ी भाषा में मशरूम) के नाम से भी प्रसिद्ध बनाती है। इसकी मांग सूखे रूप में होती है, और पिछले साल भारत से इसका 25 टन निर्यात दर्ज किया गया था, जिसमें फ्रांस इसका प्रमुख आयातक है।
गुच्ची मशरूम की खेती आसान नहीं है। इसे 5 से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान और उच्च आर्द्रता की जरूरत होती है। नवीन ने इसे पॉली हाउस में उगाया, जहां जंगल जैसे माहौल को नकल किया गया। इसके लिए न्यूट्रिशन पैक का इस्तेमाल किया गया, जो मशरूम को पेड़ों के बीच होने का अहसास दिलाता है। फसल को केवल तीन बार पानी देना पड़ा, और 90 दिनों में यह हार्वेस्टिंग के लिए तैयार हो गई। हार्वेस्टिंग की प्रक्रिया 10-15 दिनों तक चलेगी।
नवीन बताते हैं, “यह फसल ऑर्गेनिक जमीन पर ही उग सकती है। अगर जमीन पर पहले कीटनाशक या यूरिया का इस्तेमाल हुआ हो, तो यह फसल संभव नहीं है।” पौड़ी की जमीन प्राकृतिक रूप से ऑर्गेनिक होने के कारण इसके लिए उपयुक्त साबित हुई।
नवीन पटवाल का मानना है कि पलायन रोकने के लिए कमर्शियल फसलों की ओर बढ़ना जरूरी है। गुच्ची मशरूम की ऊंची कीमत और कम पानी की जरूरत इसे पहाड़ों के लिए आदर्श बनाती है। वे कहते हैं, “पहाड़ों में परिवहन एक बड़ी समस्या है, लेकिन अगर फसल की कीमत अधिक हो और इसे सूखा कर बेचा जा सके, तो यह गेम चेंजर साबित हो सकता है।” 5-10 किलो ताजी फसल सूखने पर 1-1.5 किलो रह जाती है, जिसे इकट्ठा कर दिल्ली जैसे बाजारों में बेचा जा सकता है। उनका अगला लक्ष्य हर्षिल जैसे ठंडे क्षेत्रों में इस फसल का ट्रायल करना है, जहां मार्च के बाद तापमान सामान्य होने पर खेती शुरू की जा सकती है। इससे पूरे उत्तराखंड में रोटेशन के आधार पर इसकी खेती संभव हो सकेगी।
गुच्ची मशरूम न केवल आर्थिक रूप से मूल्यवान है, बल्कि पोषण से भी भरपूर है। यह मिशेलिन स्टार रेस्तरां और हाई-एंड शादियों में इस्तेमाल होता है। इसके निर्यात के लिए भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) की जांच जरूरी होती है, और कश्मीर के व्यापारी पहले ही नवीन से संपर्क कर चुके हैं।
पौड़ी में जहां खेत बंजर और घर वीरान पड़े हैं, वहां नवीन पटवाल ने उम्मीद की किरण जगाई है। उनकी यह सफलता भारत में गुच्ची मशरूम की पहली कमर्शियल खेती का ट्रायल है, जो उत्तराखंड के इतिहास में मील का पत्थर है। यह न केवल स्थानीय युवाओं को रोजगार दे सकता है, बल्कि रिवर्स माइग्रेशन को भी प्रोत्साहित कर सकता है।
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