Sunday, November 23, 2025
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उत्तराखंड के नेशनल पार्कों की स्थिति बेहद खराब

उत्तराखंड, जिसे ‘देवभूमि’ के नाम से जाना जाता है, अपने हरे-भरे वनों और समृद्ध वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है। राज्य का 45.44% भूभाग वनाच्छादित है, जो पर्यावरणीय संतुलन के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक है। हालांकि, हाल ही में जारी “मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवोल्यूशन ऑफ 438 नेशनल पार्क एंड वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी इन इंडिया 2020-2025” रिपोर्ट ने एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि राज्य के अभयारण्यों और नेशनल पार्कों की स्थिति संतोषजनक नहीं है, और कुछ की तो बेहद खराब है।

रिपोर्ट के अनुसार, अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य की स्थिति ‘खराब’ श्रेणी में पहुँच गई है, जबकि नंदा देवी पार्क की स्थिति में भी गिरावट आई है। यह विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि अस्कोट अभयारण्य अपनी समृद्ध जैव विविधता और कस्तूरी मृग जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए जाना जाता है। तिब्बत और नेपाल सीमा से सटा यह अभयारण्य, जो 2500 से 10,000 फीट की ऊँचाई पर 300 वर्ग किलोमीटर में फैला है, प्रबंधन योजना की कमी, कर्मियों की भारी कमी और पुराने उपकरणों जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। 2020-2022 के अध्ययन में इसे ‘ठीक’ श्रेणी में रखा गया था, लेकिन अब यह ‘खराब’ श्रेणी में आ गया है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि इस महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन में लापरवाही बरती गई है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए इस मूल्यांकन में देश के 438 वन्यजीव अभयारण्यों और नेशनल पार्कों का 32 बिंदुओं पर आकलन किया गया, जिसमें संसाधनों की उपलब्धता, कर्मियों की संख्या, खतरे की स्थिति, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और बुनियादी ढांचे का प्रबंधन जैसे पहलू शामिल थे। इस विस्तृत विश्लेषण ने ‘बहुत अच्छा’, ‘अच्छा’, ‘ठीक’ और ‘खराब’ जैसी श्रेणियां निर्धारित कीं।

यह स्वीकार करना होगा कि कुछ सकारात्मक बदलाव भी हुए हैं। बिनसर, मसूरी, नंधौर अभयारण्य और गंगोत्री नेशनल पार्क ‘ठीक’ से ‘अच्छे’ की श्रेणी में पहुँचे हैं, जो दर्शाता है कि सही दिशा में किए गए प्रयास रंग ला सकते हैं। हालांकि, अस्कोट और नंदा देवी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की बिगड़ती स्थिति पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा जारी इस रिपोर्ट में अस्कोट अभयारण्य के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं, जिनमें धारचूला में वन्यजीवों के लिए एक अलग विंग की स्थापना, पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मियों की तैनाती, उच्च गुणवत्ता वाले उपकरण और हथियार उपलब्ध कराना, तथा पुराने भवनों की मरम्मत शामिल है। प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव रंजन मिश्रा का यह कहना कि रिपोर्ट में उल्लिखित कमियों पर सुधार किया जाएगा, एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे केवल एक बयान नहीं, बल्कि एक ठोस कार्य योजना में बदलना होगा।

उत्तराखंड के वन्यजीव अभयारण्य और नेशनल पार्क न केवल राज्य की प्राकृतिक विरासत का हिस्सा हैं, बल्कि वे जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी बिगड़ती स्थिति राज्य के पर्यावरण और भविष्य के लिए एक गंभीर खतरा है। अब समय आ गया है कि सरकार और संबंधित विभाग इन रिपोर्टों को गंभीरता से लें और इन बहुमूल्य प्राकृतिक संपदाओं के प्रभावी प्रबंधन और संरक्षण के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाएं। केवल तभी हम ‘देवभूमि’ के वन्यजीवों और वनों को उनकी गरिमा और महत्व के साथ संरक्षित कर पाएंगे।

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