Tuesday, February 3, 2026
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आईआईटी रुड़की ने विकसित किया क्रांतिकारी ड्रोन: कम लागत में कृत्रिम वर्षा और बर्फबारी संभव

रुड़की: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की ने पर्यावरण और जल संकट से निपटने के लिए एक अभूतपूर्व तकनीक विकसित की है। संस्थान के भू-विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ए.एस. मौर्य (Abhayanand Singh Maurya) के नेतृत्व में तैयार किया गया 11 किलोग्राम वजनी ड्रोन कम लागत में कृत्रिम वर्षा (artificial rain) और कृत्रिम बर्फबारी (artificial snowfall) कराने में सक्षम है। यह ड्रोन न केवल अनियमित वर्षा और सूखे की समस्या से जूझ रहे क्षेत्रों में मददगार साबित होगा, बल्कि मिट्टी में नमी बढ़ाकर जंगलों में लगने वाली आग की घटनाओं को भी काफी हद तक कम कर सकता है। यह ड्रोन जमीन से लगभग 4 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है, जिससे लक्षित बादलों तक पहुंचना आसान हो जाता है।

भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण असमान वर्षा, लंबे सूखे, भूजल स्तर में गिरावट और कृषि पर प्रभाव बढ़ता जा रहा है। कई क्षेत्रों में कम समय में भारी बारिश होती है, जबकि अन्य इलाकों में सूखे की स्थिति बनी रहती है। इससे कृषि उत्पादन, पेयजल सुरक्षा और जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होता है। क्लाउड सीडिंग (cloud seeding) को ऐसे में एक रणनीतिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है। क्लाउड सीडिंग में उपयुक्त बादलों में विशेष एजेंट (जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या पोटैशियम क्लोराइड) छोड़कर वर्षा को बढ़ावा दिया जाता है। इससे वायुमंडल में मौजूद नमी का बेहतर उपयोग होता है और वर्षा का वितरण समय व स्थान के अनुसार सुधारा जा सकता है।

विश्व स्तर पर क्लाउड सीडिंग मुख्य रूप से विमान-आधारित तरीके से की जाती है, जो सटीक ऊंचाई पर बादलों तक पहुंचकर एजेंट फैलाने में सक्षम है। लेकिन उच्च-गुणवत्ता वाले ड्रोन, स्वायत्त उड़ान प्रणाली और एआई-संचालित मौसम विश्लेषण में हुई प्रगति ने इसे और प्रभावी बनाया है। ड्रोन-आधारित क्लाउड सीडिंग लागत में कम, लचीली, तेज तैनाती वाली और स्थानीय स्तर पर संचालित हो सकती है, खासकर प्रायोगिक और पायलट प्रोजेक्ट्स के लिए। आईआईटी रुड़की ने अपने उद्योग भागीदार एक्सेलेसजी (AccelESG) के सहयोग से इस ड्रोन का सफल परीक्षण किया है। यह भारत में भविष्य के क्लाउड सीडिंग अनुसंधान और परिचालन में ड्रोन तथा एआई को एकीकृत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

प्रो. ए.एस. मौर्य ने बताया कि यह 11 किलो का ड्रोन पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी साबित होगा। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में जहां बर्फबारी कम होने से पर्यटन और जल संसाधन प्रभावित होते हैं, वहां कृत्रिम बर्फबारी से फायदा होगा। साथ ही, वर्षा की कमी से जंगलों में मिट्टी की नमी घट जाती है, जिससे वनाग्नि (forest fires) की घटनाएं बढ़ती हैं। इस ड्रोन से लक्षित क्षेत्रों में कृत्रिम वर्षा कर मिट्टी में नमी बनाई जा सकती है, जिससे आग लगने का खतरा कम होगा। प्रो. मौर्य ने कहा कि इस तकनीक के व्यावहारिक उपयोग के लिए सरकार से संपर्क किया जा रहा है। यदि इसे अपनाया गया तो लागत में काफी कमी आएगी, क्योंकि पारंपरिक विमान-आधारित क्लाउड सीडिंग महंगी होती है।

भारत में क्लाउड सीडिंग का इतिहास लंबा है, लेकिन हाल के वर्षों में ड्रोन-आधारित प्रयास तेज हुए हैं। 2025 में राजस्थान के जयपुर के पास रामगढ़ डैम क्षेत्र में भारत का पहला ड्रोन-एआई आधारित क्लाउड सीडिंग प्रयोग शुरू हुआ। यहां 60 विशेष ड्रोनों ने सोडियम क्लोराइड छोड़कर 30 मिनट में वर्षा उत्पन्न की। यह प्रयोग जल संकट से जूझ रहे रामगढ़ झील को पुनर्जीवित करने के लिए था। इसी तरह, दिल्ली में 2025 अक्टूबर में आईआईटी कानपुर के सहयोग से क्लाउड सीडिंग ट्रायल हुए, जहां सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड युक्त फ्लेयर्स का उपयोग किया गया। हालांकि, अपर्याप्त नमी के कारण कुछ प्रयास असफल रहे, लेकिन यह प्रदूषण नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण कदम था।

वैश्विक स्तर पर यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) ड्रोन-आधारित क्लाउड सीडिंग में अग्रणी है, जहां इलेक्ट्रिक चार्ज या लेजर वाले ड्रोनों से वर्षा बढ़ाई जाती है। चीन ने 2025 में शिनजियांग में ड्रोन से सिल्वर आयोडाइड छोड़कर लाखों गैलन वर्षा उत्पन्न की। भारत में यह तकनीक कृषि, जल संरक्षण और आपदा प्रबंधन में क्रांति ला सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही बादलों का चयन और एआई से मौसम पूर्वानुमान से सफलता दर 10-35% तक बढ़ सकती है।

आईआईटी रुड़की का यह ड्रोन न केवल तकनीकी नवाचार है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने का एक व्यावहारिक हथियार भी है। पहाड़ी राज्यों में जहां प्राकृतिक बर्फबारी घट रही है, वहां पर्यटन और जल आपूर्ति को बचाने में मदद मिलेगी। जंगलों की सुरक्षा से जैव विविधता और कार्बन सिंक भी सुरक्षित रहेंगे। सरकार यदि इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनाए तो सूखा प्रभावित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी और पेयजल संकट कम होगा।

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